बुरहानपुर। शहर के सीलमपुरा स्थित करीब 200 वर्ष प्राचीन श्री स्वामीनारायण मंदिर में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। पुरुषोत्तम मास के 12वें दिन भगवान लक्ष्मी नारायण देव का दुग्धाभिषेक एवं हरि-तुलसी विवाह मनोरथ अत्यंत भक्तिभाव और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। मंदिर परिसर पूरे दिन भगवान के जयघोष, वैदिक मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन से भक्तिमय बना रहा।

प्रातःकाल से ही मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना एवं अभिषेक का क्रम प्रारंभ हो गया था। भगवान लक्ष्मी नारायण देव पर दूध की अविरल धारा बहाई गई, जिसके दिव्य दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचे। इंदौर से जयसुख भाई के नेतृत्व में लगभग 35 महिला एवं 25 पुरुष हरिभक्तों का जत्था विशेष रूप से बुरहानपुर पहुंचा। सभी भक्तों ने अभिषेक एवं विशेष पूजा में भाग लेकर धर्मलाभ प्राप्त किया।
पुरुषोत्तम मास के अवसर पर देशभर से संत-महात्माओं एवं हरिभक्तों का मंदिर में आगमन लगातार जारी है। इसी क्रम में जळगांव से संत ब्रह्मचारी एवं हरिभक्त भी मंदिर पहुंचे और भगवान के दर्शन कर पूजा-अर्चना की।
दिव्य अभिषेक के पश्चात मंदिर में भगवान हरि एवं तुलसी विवाह का मनोरथ अत्यंत भावपूर्ण वातावरण में प्रस्तुत किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार और मंगलाष्टकों के बीच भगवान हरि के साथ तुलसी विवाह संपन्न कराया गया। इस दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर भक्ति और आनंद का अनुभव किया। पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक उल्लास से गुंजायमान हो उठा।
इधर कथा वाचन के दौरान व्यासपीठ पर विराजित शास्त्री चिंतन प्रियदास जी महाराज ने पुरुषोत्तम मास की महिमा का विस्तृत वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश प्रदान किया। उन्होंने कहा कि जब भक्त भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करता है, तो भगवान स्वयं भक्त के वश में हो जाते हैं। भगवान केवल निष्कपट भक्ति और प्रेम से ही प्रसन्न होते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य का थोड़ा सा भी सच्चा प्रेम भगवान के प्रति जागृत हो जाए, तो भगवान स्वयं भक्त के जीवन में कृपा बरसाने लगते हैं। जितनी अधिक भजन-भक्ति होगी, उतना ही जीव का कल्याण होगा। शास्त्रीजी ने पद्म पुराण एवं स्कंद पुराण के दृष्टांतों के माध्यम से बताया कि पुरुषोत्तम मास में व्रत, स्नान, दान एवं भक्ति करने से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
उन्होंने मनुष्य जीवन को सर्वोत्तम बताते हुए कहा कि अन्य योनियों में जीव केवल कर्मों का फल भोगता है, जबकि मनुष्य योनि ही ऐसी है जिसमें आत्मकल्याण और मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया जा सकता है। कथा के माध्यम से उन्होंने लोभ, अधर्म और पाप से दूर रहकर धर्म एवं सत्कर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
कथा के अंत में शास्त्री चिंतन प्रियदास जी महाराज ने सभी श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास में अधिक से अधिक भजन, सेवा, सत्संग और भगवान के स्मरण में समय व्यतीत करने का आह्वान किया।




































