बुरहानपुर (मध्यप्रदेश हेड रमाकांत मोरे) जिले के ग्राम अडगांव में सात दिवसीय संगीत में शिव महापुराण कथा एवं अखंड हरी नाम संकीर्तन सोहला के छठवे दिवस पर व्यासपीठ से कथावाचक हरी भक्त परायण महंत नितीनदास जी महाराज ने अपनी मधुरवाणी से बताया की भगवान गणेशजी के जीवन में माता-पिता का स्थान सर्वोपरी है, माता पार्वती ने उन्हें स्नेह, सुरक्षा और संस्कार दिए, और पिता शिव ने त्याग, अनुशासन तथा कर्तव्य का बोध कराया, गणेशजी का द्वारपाल बनना माता की आज्ञा का सम्मान है, जो आज्ञाकारिता सिखाता है, परिक्रमा की कथा में माता-पिता को ही संपूर्ण ब्रह्मांड मानकर उन्होंने प्रथम स्थान पाया, जिससे संदेश मिलता है कि माता-पिता का आदर सर्वोच्च धर्म है । गणेशजी का विवेक, धैर्य और विनम्रता माता-पिता के मार्गदर्शन से विकसित हुए, इसलिए गणेशजी हमें सिखाते हैं की सफलता, बुद्धि और मंगलता की जड़ें माता-पिता के सम्मान, सेवा और विश्वास में ही होती हैं, यह शिक्षा हर परिवार और विद्यार्थी के लिए सदैव प्रेरणादायक मार्ग जीवन में दिखाती है । भगवान गणेशजी का जीवन माता-पिता के आदर और संस्कारों का श्रेष्ठ उदाहरण है। माता पार्वती का योगदान माता पार्वती ने गणेशजी को प्रेम, सुरक्षा और संस्कार दिए। उनकी आज्ञा का पालन करते हुए गणेशजी का द्वारपाल बनना मातृभक्ति दर्शाता है।

पिता शिव की भूमिका पिता शिव ने उन्हें अनुशासन, त्याग और कर्तव्य का बोध कराया। कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य रखना उन्होंने भगवान शिवजी से सीखा। परिक्रमा की कथा में माता-पिता को ही संपूर्ण संसार मानना, उनके प्रतघ सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है। गणेशजी का जीवन सिखाता है की सफलता, बुद्धि और संस्कारों की नींव माता-पिता के सम्मान, सेवा और आज्ञा में निहित है।




































